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TRIVENI TYPING MANSAROVAR COMPLEX CHHINDWARA MOB-7089973746

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हमारे वैचारिक आभामंडल को चुनाव की मौसमी छूत ने जकड़ लिया है। एटम बमों के जोर पर ऐंठी इस दुनिया में जब तरह-तरह के पलीते लगाए जा रहे हों, तब हमारे राजनेता क्या कर रहे हैं? वे इस खतरनाक वक्त में देश को एकजुट करने के बजाय विभाजक कुतर्क बुन रहे हैं। उनकी ऐसी हरकतों से यह मुल्क खुद को शर्मसार महसूस करता है। भरोसा हो, तो बीएमसी यानी बृहन्मुंबई महानगरपालिका चुनाव पर नजर डाल देखिए। ये वार्ड स्तर के चुनाव थे, लेकिन इसे जीतने के लिए क्या-क्या नहीं किया गया? कल तक जो ठाकरे बंधु एक-दूसरे के खिलाफ थे, वे एकजुट हो गए। राज ठाकरे के भाषणों में शिवसेना का लगभग छह दशक पुराना तमिल विरोध उभर आया। वह तमिलभाषी मुंबइकरों को ‘रसमलाई’ कह रहे थे। उनके लिए ‘लुंगी’ और ‘पुंगी’ जैसे अल्फाजों का इस्तेमाल कर रहे थे। ये शब्द शिवसेना के जनक बालासाहेब ठाकरे के पुराने शब्दकोश से उधार लिए गए थे। बालासाहेब ने 1960-70 के दशक में दक्षिण भारतीयों की खिलाफत अपनी कार्टून साप्ताहिक मैगजीन मार्मिक और जनसभाओं के जरिये शुरू की थी। सवाल उठता है, मुंबई के विकास में अगर गैर-मराठी लोगों की सतत भूमिका है, तो फिर वे वहां के हवा-पानी पर हक-हुकूक क्यों नहीं रख सकते? इनमें से तमाम की कई पीढ़ियां यहां खप चुकी हैं। यह ‘आमची मुंबई’ अब उनका स्थायी पता है। फिर ऐसा क्यों हो रहा है? बीएमसी से कहीं 30 साल पुराना प्रभुत्व खत्म हो जाए, इसलिए ठाकरे परिवार ने बालासाहेब के ‘मराठा मानुष’ नारे को नए रंग-रोगन के साथ पेश करने की कोशिश की। ठाकरे बंधु राजनीति के प्रचलित भूगोल को अनदेखा कर उस पुराने टोटके पर यकीन कर रहे थे कि भड़की हुई भावनाएं लोगों को एकजुट करती हैं। बिखराव रोकने की बात पर मुझे पवार परिवार याद गया। आपको याद होगा  

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