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शिक्षा को भारतीय समाज में ‘मंदिर’ कहा जाता रहा है/////////////////////UPSI ASI HINDI TYPING TEST

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—एक ऐसा पवित्र स्थान जहाँ ज्ञान, संस्कार और भविष्य का निर्माण होता है। लेकिन हाल के वर्षों में जिस तरह से शिक्षण संस्थानों से यौन उत्पीड़न, मानसिक शोषण, डर और असुरक्षा की खबरें सामने रही हैं, उसने इस धारणा को गहरी चोट पहुँचाई है। सवाल यह नहीं है कि घटनाएँ हो रही हैं या नहीं, बल्कि यह हैकि क्या हमारे स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय वास्तव में छात्राओं के लिए सुरक्षित हैं? शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार नहीं, बल्कि सुरक्षित और संवेदनशील नागरिक तैयार करना भी है। प्रोफेसरों पर आरोप, प्रबंधन की भूमिका, शिकायतों को दबाने की प्रवृत्ति और पीड़िताओं को चुप कराने का सामाजिक दबाव—येसब मिलकर एक ऐसी संरचना बनाते हैं, जहाँ अपराध से ज्यादा खतरनाक हो जाता है उसका छिपाया जाना। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि अधिकांश मामलों में पीड़ित सामने आने से डरती हैं। डर—करियर के खत्म हो जाने का, बदनामी का, संस्थान से निकाले जाने का और समाज द्वारा दोषी ठहरा दिए जाने का। यही डर अपराधियों को ताकत देता है और व्यवस्था को मौन रहने का बहाना। जब शिकायत करना ही जोखिम बन जाए, तब कानून की मौजूदगी भी बेमानी लगने लगती है। कानून अपने स्तर पर मौजूद है। यौन उत्पीड़न से जुड़े नियम, आंतरिक शिकायत समितियाँ (आईसीसी), विशाखा दिशानिर्देश और पोश अधिनियम—सबकुछ कागजों में है। लेकिन वास्तविकता यह है कि कई संस्थानों में ये समितियाँ या तो नाममात्र की हैं या फिर प्रबंधन के प्रभाव में काम करती हैं। शिकायतकर्ता को न्याय दिलाने के बजाय मामले को “संस्था की छवि” के नाम पर दबाने की कोशिश की जाती है। यही कारण है कि न्याय की प्रक्रिया पीड़िता के लिए एक और मानसिक उत्पीड़न बन जाती है। शिक्षण संस्थानों में सत्ता का असंतुलन भी इस समस्या की जड़ में है। शिक्षक, प्रबंधन और प्रशासन के पास मूल्यांकन,नियुक्ति, प्रमोशन और भविष्य तय करने की शक्ति होती है। इस शक्ति का दुरुपयोग जब व्यक्तिगत इच्छाओं के लिए किया जाता है, तो छात्रा या जूनियर स्टाफ खुद को असहाय महसूस करता है। यही असहायता अपराध को जन्म देती है और अपराधी को संरक्षण। एक और गंभीर मुद्दाहै—संवेदनशीलता की कमी। शिक्षा केवल पाठ्यक्रम और डिग्री तक सीमित हो गई है। नैतिकता, लैंगिक सम्मान और मानवीय मूल्यों की बात भाषणों तक सिमट गई है। जब शिक्षक ही मर्यादा लांघते दिखाई दें, तो छात्रों को समाज से क्या संदेश जाता है? ऐसे में “शिक्षा का मंदिर” कहना एक विडंबना बनकर रह जाता

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