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TRIVENI TYPING MANSAROVAR COMPLEX CHHINDWARA MOB-7089973746
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प्रस्तावित नियमों में दूसरी गंभीर खामी यह है कि साल 2012 के नियमों के उलट ये भेदभाव के रूपों का वर्गीकरण नहीं करते हैं। 2012 के नियम में अस्पृश्यता अपराध अधिनियम-1955 और अत्याचार अधिनियम-1989 की तर्ज पर नामांकन, मूल्यांकन, शिक्षण, खेल, सामाजिक जीवन, हॉस्टल और डाइनिंग हॉल से संबंधित 28 प्रकार के भेदभाव की सूची दी गई है। अस्पृश्यता की जड़ों को देखते हुए, अस्पृश्यता अपराध अधिनियम-1955 ने लगभग 17 और अत्याचार अधिनियम-1989 ने लगभग 40 प्रकार के भेदभाव की पहचान की थी। मौजूदा प्रस्तावित नियम 2012 के नियमों की भावना के खिलाफ जाकर यह काम इक्विटी कमेटी पर छोड़ देता है। इसमें कहा गया है कि इक्विटी कमेटी को भेदभाव वाले कृत्यों की उदाहरण वाली सूची बनानी व प्रसारित करनी होगी। यह कल्पना करना मुश्किल है कि इक्विटी कमेटी को अस्पृश्यता की गहराई और भेदभाव की पर्याप्त समझ होगी। सुप्रीम कोर्ट ने अत्याचार अधिनियम-1989 के संदर्भ में इसकी जटिलता का जिक्र करते हुए कहा था, ऐसे अपराध अनुसूचित जाति और जनजातियों को अपमानित करने और दबाने के लिए किए जाते हैं, ताकि उन्हें दमित जा सके। इसमें गहरी घृणा, अपमानजनक व नीच व्यवहार शामिल हैं। इसलिए, वे विशिष्ट किस्म के अपराध हैं, जिनकी तुलना भारतीय दंड संहिता (अब भारतीय न्याय संहिता) के तहत आने वाले अपराधों से नहीं की जा सकती। आईआईटी मुंबई की एक घटना जातिवादी बीमार मानसिकता के उदाहरण के लिए सटीक होगा। दलित लड़कियों से अगड़ी जाति के एक छात्र ने पूछा, कोटा से आई हो या कोठे से आई हो? अपने घिनौने स्वभाव के कारण, भेदभाव के रूपों को सरकार ने दोनों अधिनियमों में वर्गीकृत किया है। शिक्षण संस्थान में इक्विटी कमेटी भेदभाव के कई रूपों के वर्गीकरण में सक्षम नहीं है। इसके अलावा, अगर पहचान का काम अलग-अलग शिक्षण संस्थानों पर छोड़ दिया जाता है, तो भेदभाव के रूप अलग-अलग होंगे और कानूनी भ्रम
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